भारत के सबसे छोटे क्रांतिकारी की कहानी, जिसने महज 12 साल की उम्र में खाई थी अंग्रेजो की गोली!

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baji story

देश को आजाद हुए सालो साल बीत चुके है, आजादी की लड़ाई के सैकड़ों महानायक आज भी हमारे मन मस्‍त‍िष्‍क में अमर हैं, वहीं सैकड़ों ऐसे भी हैं जिनकी वीर गाथा गुमनामी की खाक छान रही है। स्‍वतंत्रता संग्राम के ये वो नायक हैं, जिन्‍हें इतिहास के पन्‍नों में कहीं भुला दिया गया है। ऐसे ही एक वीर नायक की कहानी आज हम आपके लिए लेकर आये है इतिहास के पन्नो से निकाल कर। 

हम बात कर रहे हैं बाजी राउत की, जिन्हें देश का सबसे कम उम्र का शहीद माना जाता है। अंग्रेजों ने पहले उनके सिर पर बंदूक की बट से वार किया, जिससे उनका सिर फट गया। वो जमीन पर गिर पड़े फिर अंग्रेजों ने उन्हें गोली मार दी। और ये वीर बालक देश के लिए शहीद हो गया। 

ओडिशा के ढेंकनाल में हुआ था जन्म

Amar shaheed baji

स्‍वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बाजी राउत को देश का सबसे कम उम्र का शहीद बताया गया है। अपनी जन्मभूमि के लिए जान पर खेलने वाले सबसे कम उम्र के शहीद, बाजी का जन्म ‘उड़ीसा’ में ‘धेनकनाल’ जिले के एक छोटे से गाँव नीलकंठपुर में हुआ। बाजी के पिता हरि राउत पेशे से नाविक थे। पिता का देहांत हो जाने पर मां ने ही उन्हें पाला। मां दूसरों के खेतों में काम कर पैसे जुटाई थी।

वानर सेना में शामिल थे बाजी राउत

जंहा बाजी का जन्म हुआ उस ढेंकनाल के राजा शंकर प्रताप सिंहदेव थे। 1926 में इन्होंने उड़ीसा में ढेंकनाल रियासत की बागडोर सम्भाली। पिता का नाम था राजा सूर प्रताप सिंह। 1926 में राजा चल बसे तो बड़े बेटे राजकुमार शंकर प्रताप का राजतिलक हुआ। लेकिन राजकुमार तब तक लोकल ना रहकर ग्लोबल हो चुके थे।  

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बैष्णव चरण पट्टनायक और राजा श्री सूर प्रताप सिंह (Image Source: indianrajputs.com)

ब्रिटेन में उनकी वकालत चल रही थी। सो भरत की तरह राजगद्दी पर चरण पादुकाएं रख, छोटे भाई पत्तायत नृसिंह प्रताप सिंह देव ने राजकाज सम्भाल लिया। इसके बाद सुरु हुआ जनता का घनघोर शोषण, राजशाही के नाम पर नृसिंह प्रताप ने माफिया राज शुरू कर दिया। राजमहल के गुर्गे लोगों को धमका के चंदा उगाहने लगे। नए-नए टैक्स लगाए गए। 

बाजी की माँ भी कई बार उसके शोषण का ग्रास बनी। जिससे तंग आकर गाँव के कुछ लोगों ने राजा के विरुद्ध आवाज उठाई और “प्रजामंडल” नाम की पार्टी का गठन किया, जिसमें बच्चों का एक ग्रुप बनाया था, जिसका नाम था वानर सेना। बाजी इसी वानर सेना का हिस्‍सा थे।

ढेंकनाल में तेज होने लगी बगावत 

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ढेंकनाल रियासत का राजमहल (Image Source: indianrajputs.com)

प्रजामंडल. प्रजा ने ही अपना नायक भी चुना, बैष्णव चरण पट्टनायक। पटनायक रेलवे विभाग में पेंटर की नौकरी करते थे, लेकिन रेलवे के जरिेए वो दूसरी जगहों पर घूमकर बगावत की आग को दूर-दूर तक पहुंचाते थे। बीर बैष्णव पेंटिंग के काम से जहां भी जाते, वहां-वहां राजा साहब की महिमा पर काला रंग पोत आते। उनकी मेहनत का नतीजा हुआ कि आसपास की रियासतों में भी प्रजा मंडल खड़े हो गए। 

अपनी सत्ता को उखड़ता देख राजा राजा शंकर प्रताप घबरा गया, और मित्र अंग्रेजों से मदद मांगी। जिसके बाद कोलकाता से 250 अंग्रेज सैनिकों की एक टुकड़ी ढेंकानाल भेजी गई। अब टक्कर सत्ता के गठबंधन और जनता के संगठन के बीच थी। बीर बैष्णव और आंदोलन के बाकी नेताओं की सारी सम्पत्ति हड़प ली गई। 

इतने से भी मन ना भरा तो अंग्रेज सैनिकों को बीर बैष्णव के पीछे लगा दिया गया।  10 अक्टूबर 1938 के दिन अंग्रेजों को खबर लगी कि बैष्णव भुबन गांव में छुपे हुए हैं। उसी दिन गांव पर हमला कर दिया गया। अंग्रेजों ने गांववालों पर फायरिंग शुरू कर दी, घरो को आग लगा दी... पूरा गांव तहस नहस कर दिया। इस दौरान गांव बालो में कुछ एक की मौते भी हुई। 

नदी किनारे रात में पहरा दे रहे थे बाजी

गांव के बग़ल से एक नदी बहती थी, ब्राह्मणी नदी। अंअंग्रेज नदी के रास्ते गांव से भागना चाहते थे, लेकिन उसी नदी पर बाजी राउत पहरा दे रहे थे। अंग्रेज सैनिक पहुंचे तो उन्होंने बाजी से नदी पार कराने को कहा। बाजी ने कोई जवाब नहीं दिया। दोबारा कहने पर बाजी ने इनकार दिया। वो विद्रोहियों को एलर्ट करना चाह रहे थे कि अंग्रेज भाग रहे हैं। इसलिए उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया।

जब पुलिस ने दोबारा पूछा तो 12 साल के साहसी बाजी ने सिरे से इनकार कर दिया। प्रजामंडल के वरिष्‍ठ कार्यकर्ताओं ने बाजी से रातभर पहरा देने को कहा था। अब मौका कार्यकर्ताओं को सचेत करने का था। बाजी ने शोर मचाना शुरू कर दिया। गुस्‍से में आकर एक अंग्रेजी पुलिस वाले से बाजी के सिर पर बंदूक की बट से वार किया।

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image Source: NBT

बाजी का सिर फट गया। खून से लथपथ बाजी वहीं गिर गए। लेकिन उन्‍होंने शोर मचाना नहीं छोड़ा। अंग्रेजी सिपाही छोटे बच्चे के साहस को देख आक्रोशित हो गए बाजी के सीने पर गोली चला दी और भारत माता के इस नन्हें से लाल ने मातृभूमि की खातिर अपनी जान गवाँ दी, पर अंगेजो को नदी पार नहीं जाने दिया। 

और आज ही के दिन यानी 11 अक्टूबर 1938 को 12 साल का बाजी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाला सबसे कम उम्र का क्रांतिकारी बन गया। अंग्रेजों ने बाजी को मार दिया. लेकिन बाजी अपनी ड्यूटी पूरी कर चुका था। उसकी तेज आवाज़ सुन कुछ ही देर में गांव वाले घाट पर पहुंच गए। 

Amar Shaheed Baji
image Source: क्विंट

अंग्रेज नाव लेकर खुद ही भागने लगे। उन्होंने गांववालों पर फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें चार लोग मारे गए। पांचों शहीदों के पार्थिव शरीर को ट्रेन से कटक ले ज़ाया गया। कटक की सड़कों पर उस दिन हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। 12 साल के बाजी की कहानी सुन सभी की आंखें नम थीं। 

बाजी समेत गांववालों की शहादत से आंदोलन और भड़क उठा। धन्य है ! यह जाँबाज़ बालक जिसने कम उम्र में खिलौनों से खेलने के बजाय मौत का खेल खेला और जीत भी हासिल की। ऐसे नन्हे वीर सपूत को हमारा शत-शत नमन।