जानें कौन हैं? नंगे पैर, धोतीनुमा कपड़े लपेटी...जब राष्ट्रपति से पद्मश्री पाने पहुंचीं 'तुलसी गौड़ा'

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tulsi gauda

हमारे देश में ऐसे कई लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ के देश में परिवर्तन लाने के लिए अपना पूरा जीवन दूसरों की सेवा भाव में लगा देते हैं। इन्ही में से एक है तुलसी गौड़ा, और अब आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा को पर्यावरण की सुरक्षा में उनके योगदान के लिए सोमवार को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

देश में सोमवार को भारत के राष्ट्रपति ने सात हस्तियों को पद्म विभूषण, 10 को पद्म भूषण और 102 को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। तुलसी गौड़ा, नंगे पांव और धोतीनुमा पारंपरिक कपड़े पहने, उन्हें नई दिल्ली में समारोह के दौरान राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार मिला।

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तुलसी गौड़ा को जब राष्ट्रपति भवन में ये सम्मान मिला तो दरबार हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। ट्विटर यूजर्स ने भी इन दोनों शख्सियतों को लेकर रिएक्ट किया। कर्नाटक की रहने वाली पर्यावरणविद तुलसी गौड़ा को 'जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया' के नाम से भी जाना जाता है। 


गौड़ा ने 30,000 से अधिक पौधे लगाए हैं और वन विभाग की नर्सरी की देखभाल करती हैं। तुलसी गौड़ा को सम्मानित करने के साथ ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस अवसर पर उन्हें बधाई दी। इसके साथ ही भारत के राष्ट्रपति के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने ट्वीट करते हुए लिखा:-

"राष्ट्रपति कोविंद ने सामाजिक कार्य के लिए श्रीमती तुलसी गौड़ा को पद्म श्री प्रदान किया। वह कर्नाटक की एक पर्यावरणविद् हैं, जिन्होंने 30,000 से अधिक पौधे लगाए हैं और पिछले छह दशकों से पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों में शामिल हैं।"

आपको बता दे, कर्नाटक में हलक्की स्वदेशी जनजाति से ताल्लुक रखने वाली तुलसी गौड़ा एक गरीब और वंचित परिवार में पली-बढ़ी हैं। वहीं इससे पहले उन्हें 'इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र अवॉर्ड', 'राज्योत्सव अवॉर्ड' और 'कविता मेमोरियल' जैसे कई अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। 

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आपको बता दे, उन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, और फिर भी आज उन्हें 'जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया' के रूप में जाना जाता है। पौधों और जड़ी-बूटियों की विविध प्रजातियों पर उनके विशाल ज्ञान के कारण उन्हें इस नाम से पुकारा जाता है।

12 साल की उम्र से उन्होंने हजारों पेड़ लगाए और उनका पालन-पोषण किया। तुलसी गौड़ा एक अस्थायी स्वयंसेवक के रूप में वन विभाग में भी शामिल हुईं, जहाँ उन्हें प्रकृति संरक्षण के प्रति समर्पण के लिए पहचाना गया।