जब झाड़ू लगाने वाली मां के रिटायरमेंट फंक्शन में पहुंचे कलक्टर, डॉक्टर और इंजीनियर बेटे

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बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए मां बाप के संघर्ष की बहुत कहानियां अपने सुनी होंगी लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जो परिजनों के संघर्षों को एक खुशनुमा मुकाम दे देती हैं। ये कहानी थोड़ी पुरानी जरूर है, लेकिन प्रेरणा देने के लिए आज भी अपना अलग मुकाम रखती है।

ये कहानी है समर्पण की, ये कहानी है एक माँ की और उसकी जी तोड़ मेहनत की। ये कहानी उस माँ की है जिसने अपना सुख दुःख भूल अपने बेटो को पढ़ाया और इस काबिल बनाया कि लोग आज उन्हें डॉक्टर, कलेक्टर और इंजीनयर की माँ कहते है। आइये आपको मिलवाते है उस माँ से।

माँ के रिटायरमेंट पर पहुंचे कलेक्टर-इंजीनियर और डॉक्टर बेटे

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बात 2016 की है, झारखंड के रामगढ़ जिले के रजरप्पा टाउनशिप में पिछले 30 सालों से झाड़ू लगाने वाली सुमित्रा देवी की चर्चा उस बक्त और तेज हो गई जब उनके रिटायरमेंट पर उन्हें एक नायाब तोहफा देखने को मिला।

और ये तोहफा था, कलेक्टर-इंजीनियर और डॉक्टर बेटो का आगमन। दरअसल, जैसे ही रिटायरमेंट फंक्शन शुरू हुआ, वहां तीन बड़े अफसर पहुंचे। एक अफसर नीली बत्ती लगी गाड़ी में पहुंचे तो दो अफसर अलग-अलग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में पहुंचे।

उनमें एक थे बिहार के सिवान जिले के कलक्टर महेन्द्र कुमार, दूसरे रेलवे के चीफ इंजीनियर वीरेन्द्र कुमार और तीसरे थे मेडिकल अफसर धीरेन्द्र कुमार। ये तीनों सुमित्रा देवी के बेटे हैं जिन्हें उन्होंने बड़ी मेहनत से न केवल पाला-पोषा बल्कि उन्हें बड़ा अधिकारी बनाया।

जब तीनों बेटे वहां पहुंचे तो सुमित्रा देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने अपने तीनों बेटों का वहां मौजूद अपने अधिकारियों से परिचय कराया तो सबके सब दंग रह गए।

मां ने मेहनत कर बेटों को बनाया काबिल

झारखंड के रामगढ़ के रजरप्पा निवासी चतुर्थश्रेणी कर्मचारी सुमित्रा देवी ने पति की सालों पहले मौत हो गई थी। पति की असमय मौत से बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा सुमित्रा देवी के कंधों पर आ गया। पढ़ी लिखी न होने के कारण सुमित्रा देवी को कोई बड़ी नौकरी नहीं मिल सकी तो उन्होंने नगर पालिका की टाउनशिप में झाडू लगाने का काम शुरू कर दिया।

जल्द ही उन्हें पालिका की ओर से पक्की नौकरी पर रख लिया गया। इसी दौरान सुमित्रा ने मेहनत कर अपने तीनों बेटों को पढ़ा लिखा कर खूब आगे बढ़ाया। बेटों ने भी मां की मेहनत को जल्द मुकाम दिया और बड़े बेटे वीरेन्द्र कुमार इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रेलवे में इंजीनियर हो गए।

दूसरे बेटे धीरेन्द्र कुमार एमबीबीएस की पढ़ाई कर डॉक्टर बने और सबसे छोटे महेन्द्र कुमार आईएएस में चयनित हो गए। यह इस माँ के लिए गर्व का क्षण था, जिसने जीवन की हर एक विपत्ति और कठिनाई का सामना करते हुए अपने बच्चों पालन-पोषण किया।

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अपने बेटों को अच्छी नौकरी मिलने के बाद भी सुमित्रा देवी ने सीसीएल में ग्रुप चार की यह नौकरी नहीं छोड़ी। इस स्वावलंबी महिला ने 30 साल पहले सीसीएल टाउनशिप की सड़कों की साफ़-सफाई से शुरुआत की थी और वे अंत तक इस काम को करते हुए गर्व के साथ रिटायर होना चाहती थीं।

दो दिन पहले टाउनशिप में अधिकारियों ने उनकी सेवानिवृत्ति पर छोटे से कार्यक्रम का आयोजन किया तो तीनों काबिल बेटे मां की खुशी में शामिल हुए। अधिकारियों ने इस दौरान उन्हें भी सम्मानित किया। 

माँ सुमित्रा ने कहा:-

“आखिरकार भगवान की कृपा और बेटों की मेहनत से वह सपना सच हो गया। भले ही बेटे अधिकारी हो गए मगर उन्होंने अपनी झाड़ू लगाने की नौकरी इसलिए नहीं छोड़ी कि इसी छोटी नौकरी की कमाई से उनके बेटे पढ़-लिखकर आगे बढ़ सके। आज उनके बेटे उन्हें गर्व का अहसास करा रहे हैं।”

कलेक्टर महेन्द्र कुमार ने बड़े ही भावुक अंदाज में कहा, जीवन में कोई भी काम मुश्किल नहीं है। इमानदारी से की हुई कड़ी मेहनत से सब संभव हो जाता है। मेरी माँ और हमने अपने जीवन में मुश्किल समय देखा है पर फिर भी उन्होंने हमें कभी टूटने या निराश नहीं होने दिया। मुझे गर्व है कि हम सब उनकी कड़ी मेहनत और उम्मीदों पर खरे उतर पाए हैं।