सडकों पर भीख मांगने वाला लड़का पहुंचा UK कैम्बिज यूनिवर्सिटी, भाग्य ने ली गजब की करवट!

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jayabel

कहते हैं ना जब किस्मत अपना खेल खेलती है तो जिंदगी की परेशानियों को भी ठेंगा दिखा देती है। ऐसे में अगर उस पर लगन का तड़का और लग जाए तो किस्मत चमकने ने ज्यादा वक्त नहीं लगता। कुछ ऐसा ही हुआ चेन्नई निवासी जयावेल के साथ। जयावेल की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। जयावेल का परिवार साल 1980 में फसल बर्बाद होने के कारण नेल्लौर से चेन्नई पहुंचा था। इस दौरान उनके माता-पिता दोनों ही भीख मांगकर परिवार का गुजर-बसर करते थे। स्टोरी पुरानी है, मगर प्रेरणा के लिए आज भी जाग्रत है.

ऐसे में जयावेल भी अपने माता पिता के साथ भीख मांगने लगे। वह बहुत छोटे थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद उनकी मां को पति की मौत का इतना गहरा सदमा लगा कि वह शराब के नशे में चूर रहने लगी। उन्हें शराब की लत इस कदर लग गई कि वह रोज भीख मांग कर जो पैसे इक्ट्ठे करती उसे शराब में उड़ा देती। ऐसे हालातों में जयावेल के पास अपने और अपने दोनों भाई-बहनों के गुजर-बसर करने के लिए एकमात्र रास्ता भीख मांगना ही था।

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भीख मांगने के दौरान ही जयावेल की मुलाकात उमा मुथुरमन से हुई। उमा मुथुरामन उनकी जिंदगी में एक टर्निंग पॉइंट बनकर आई। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर जयावेल और उनके दोनों भाइ-बहनों का एडमिशन अपनी संस्था के तहत एक स्कूल में करा दिया। बता दें मुथुरामन सुयंम चैरिटेबल ट्रस्ट की संचालक है। वह और उनके पति इस संस्था के तहत सड़कों पर भीख मांगने वाले बच्चों को की मदद करते हैं।

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उन्होंने जब जयावेल का दाखिला कराया, तो 12वीं में अच्छे अंक लाने पर उन्हें कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में एंट्रेंस देने का मौका मिला। उन्होंने इसे भी पास कर लिया। इसके बाद उनका एडमिशन कार से संबंधित एक कोर्स में लंदन यूनिवर्सिटी में हो गया। यह कोर्स खत्म करके जयावेल फिलीपींस में विमान मेंटेनेंस टेक्नोलॉजी से संबंधित कोर्स की पढ़ाई के लिए वहां चले गए।

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जयावेल का कहना है कि उन्होंने अपनी पूरी शिक्षा के लिए जो ऋण लिया था वह उसे चुकाने के बाद अपनी मां के लिए एक घर बनवाना चाहते हैं। वह अपने इस पूरे सफर के लिए सुयंम एनजीओ को तहे दिल से धन्यवाद करते हैं। उनका कहना है कि वह अपना आगे का जीवन सुयंम एनजीओ को समर्पित करना चाहते हैं। उन्हें आज भी वह दिन याद है जब संस्था की संस्थापक उमा मुथुरामन उनसे पहली बार मिली थी। उनकी उस पहली मुलाकात में उनकी जिंदगी बदल दी। एनजीओ के दूसरे बच्चों के लिए जयावेल एक मिसाल है।