सावित्रीबाई फुले: लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो लोग गालियां देकर गोबर-कीचड़ फेंकने लगे!

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savitribai phule

आज ही के दिन 1831 में देश की पहली महिला टीचर सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सतारा के नायगांव में एक किसान परिवार में हुआ था।  9 साल की उम्र में उनकी शादी ज्योतिराव फुले से हो गई। ससुराल में कदम रखते वक्त उनके पास एक अमूल्य निधि थी, एक किताब, जो उन्हें एक ईसाई मिशनरी दी थी। 

जिनसे उनकी शादी हुई, बह ज्योतिबा बहुत बुद्धिमान थे, उन्होंने मराठी में अध्ययन किया. वे महान क्रांतिकारी, भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक एवं दार्शनिक थे। वंही सावित्रीबाई फुले को भारत की सबसे पहली आधुनिक नारीवादियों में से एक माना जाता है।

महिला शिक्षा की जननी सावित्रीबाई फुले 

1840 में महज नौ साल की उम्र में सावित्रीबाई का विवाह 13 साल के ज्योतिराव फुले से हुआ था। विवाह के समय सावित्री बाई फुले पूरी तरह अनपढ़ थीं, तो वहीं उनके पति तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। जिस दौर में वो पढ़ने का सपना देख रही थीं, उस बक्त दलितों को शिक्षा तो दूर की बात उनकी परछाई से लोग दूर हटकर खड़ा हुए करते थे। यह एक कुरीति थी, जो आज भी समाज में कंही न कंही देखने को मिल ही जाती है। 

तब दलितों के साथ उस वक्त की एक घटना के अनुसार एक दिन सावित्री अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं, तभी उनके पिताजी ने देख लिया। वो दौड़कर आए और किताब हाथ से छीन कर बाहर फेंक दी। इसके पीछे ये वजह बताई कि शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है, दलित और महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करना पाप था।  

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बस उसी दिन वो किताब वापस लाकर प्रण कर बैठीं कि कुछ भी हो जाए वो एक न एक दिन पढ़ना जरूर सीखेंगी। लेकिन पिता के घर उनकी यह इच्छा पूरी ना हो सकी, बहुत छोटी सी उम्र में उनकी शादी ज्योतिराव से कर दी गई। 

जब उनकी शादी ज्योतिराव फुले से हुई तो उन्होंने अपने पढ़ने की इच्छा अपने पति के सामने रखी, जिसका पहले तो परिवार ने विरोध किया लेकिन पति ज्योतिराव फुले ने उनका साथ दिया। उन्होंने सावित्री को आगे बढ़ने में प्रेरित करते हुए शिक्षित करने का फैसला लिया। और फिर दिन भर काम के बाद रात को वो सावित्रीबाई को अपने साथ बिठाते और पढ़ाते। 

लड़कियों की शिक्षा के लिए देश का पहला स्कूल 

उन दिनों भारत में दलितों को अछूत और लड़कियों को पुरुष की सेविका के तौर पर देखा जाता था। पुरुषो का मानना था, कि पढाई लड़कियों के लिए नहीं होती है, यह कार्य पुरुषो के लिए होता है। यह सोच सवर्ण समाज के विद्वानों की थी, तो जरा सोचिये बह कथित विद्वान दलित और अछूतो की महिलाओ को कैसे शिक्षा ले लेने देते। लेकिन इस कुरीति के खिलाफ खड़ी हुई सावित्री, जिन्होंने प्रण लिया महिला शिक्षा का। 

और फिर फुले दम्पति ने 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवार पेठ के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के पहले स्कूल की शुरुआत की। और महज़ 17 साल की उम्र में सावित्रीबाई ने इस स्कूल में बतौर शिक्षिका पढ़ाना शुरू किया। शुरुआत में स्कूल में सिर्फ़ 9 लड़कियां पढ़ने के लिए राज़ी हुई। फिर धीरे-धीरे इनकी संख्या 25 हो गई। 

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1851 तक दोनों ने मिलकर पूने में 3 ऐसे स्कूल खोले जिनमें लड़कियों को शिक्षा दी जाती थी। स्कूल के करिकुलम में गणित विज्ञान और समाजशास्त्र भी सम्मिलित था।  इन तीनों स्कूलों को मिलाकर छात्रों की संख्या 150 थी। लेकिन ये सब शांति से नहीं हुआ। एक पिछड़ी जाति की महिला खुद पढ़े, और दूसरों को भी पढ़ाए, ये धर्म के ठेकेदारों को मंज़ूर नहीं था। 

साम-दाम-दंड-भेद सब आज़माए गए, सबसे पहले घर से ही शुरुआत हुई। धर्म के ठेकेदारों ने ज्योतिराव फुले के पिता को धमकाया, कि आपका लड़का धर्म के खिलाफ जाकर बगाबत कर रहा है... सुधर जाओ। लेकिन फुले दम्पति फिर भी ना माने। 

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उन्होंने अपना फैसला कायम रखा, समाज में अलख जगाने का और आगे बढ़ते रहे। तब धर्म ठेकेदार गंदी गालियां देकर अपमानित करने की कोशिश करते।  ज्योतिराव से कहा जाता, सावित्री के हाथ का खाना कीड़ों में तब्दील हो जाएगा। जब ये तय हुआ कि बातों और अफ़वाहों से काम नहीं चलेगा। तो सावित्रीबाई पर रास्ते में कीचड़ और गोबर उछाला गया। लोग उनका पीछा करते, डराते और धमकी देते। 

ज्योतिराव ने सावित्रीबाई को दो साड़ियां दी। एक को पहनकर वो स्कूल जाती। उस पर गोबर और कीचड़ उछाला जाता। तो स्कूल में वो गंदी साड़ी बदलकर दूसरी पहन लेती। जब घर जाने का वक्त आता तो दुबारा वही गंदी साड़ी पहन लेतीं। ऐसा ही चलता रहा। 

1848 से 1852 के बीच फुले दम्पति ने लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले।  सावित्रीबाई फुले को समझ आ चुका था कि शिक्षा के बिना, खासकर अंग्रेजी शिक्षा के बिना शूद्र, अतिशूद्र मुख्यधारा के में शामिल नहीं हो सकते। इसलिए वह शूद्र- अति शूद्रों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती रही। 

समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ लड़ाई 

सावित्रीबाई न केवल महिलाओं के अधिकारों के लिए ही काम नहीं किया, बल्कि वह समाज में व्याप्त भ्रष्ट जाति प्रथा के खिलाफ भी लड़ीं। जाति प्रथा को खत्म करने के अपने जुनून के तहत उन्होंने अछूतों के लिए अपने घर में एक कुआं बनवाया था। 

सावित्रीबाई न केवल एक समाज सुधारक थीं, बल्कि वह एक दार्शनिक और कवयित्री भी थीं। उनकी कविताएं अधिकतर प्रकृति, शिक्षा और जाति प्रथा को खत्म करने पर केंद्रित होती थीं।

महिला अधिकार के लिए संघर्ष करने वाली सावित्रीबाई ने विधवाओं के लिए एक केंद्र की स्थापना की और उनको पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने अछूतों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।  

वर्ष 1897 में प्लेग फैलने के दौरान उन्होंने पुणे में अपने पुत्र के साथ मिलकर एक अस्पताल खोला और अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों का इलाज किया। हालांकि इस दौरान वह स्वयं प्लेग से पीड़ित हो गईं और उसी वर्ष मार्च में उनका निधन हो गया। 

सावित्री बाई फुले इस देश की पहली महिला शिक्षिका होने के साथ साथ अपना पूरा जीवन समाज के वंचित तबके खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में देने के लिए हमेशा याद की जाएंगी।