लावारिस लाशों के मसीहा' पद्मश्री शरीफ चचा, जो कभी अपने बेटे का अंतिम संस्कार नहीं कर पाए

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अयोध्या के मोहम्मद शरीफ को लोग ‘लाशों के मसीहा’ के नाम से जानते हैं। उनकी इस समाज सेवा के लिए मोहम्मद शरीफ़ को कल शाम राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। अब तक उन्होंने 5 हज़ार से ज़्यादा लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार किया है। 

वैसे तो मोहम्मत शरीफ को पद्मश्री मिलने की घोषणा 25 जनवरी, 2020 को ही कर दी गई थी। लेकिन कोरोना संकट के चलते उन्हें और पद्म पुरस्कार पाने वाली कई हस्तियों को अब जाकर ये सम्मान मिला है। सोमवार 8 नवंबर को पद्मश्री से नवाजे जाने के बाद से ही मोहम्मद शरीफ के जिले के लोगों में खुशी की लहर है। 

कभी बेटे का नहीं कर सके थे अंतिम संस्कार

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बता दें, बुजुर्ग समाजसेवी मोहम्मद शरीफ को लावारिस लाशों के मसीहा के तौर पर जाना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने पिछले 25 वर्षों में हजारो लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 1992 में मोहम्मद शरीफ के बड़े बेटे रईस की सुल्तानपुर में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। 

शरीफ को इस हादसे के बारे में पता नहीं था। रईस की लाश सड़क पर ही पड़ी रही और कोई उसे अस्पताल नहीं ले गया। अखबार के मुताबिक रईस की लाश को जानवरों ने नोच खाया था। इस बात ने उनको अंदर तक हिला कर रख दिया, तब उन्होंने फैसला किया कि अब चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, सबका अंतिम संस्कार मैं करूंगा और तब से अब तक 3 हज़ार हिन्दू और 2 हज़ार मुस्लिम लोगों का अंतिम संस्कार कर चुके है। 

धर्म मुताबिक अंतिम संस्कार 


छोटा बेटे को खोने के बाद लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने वाले मोहम्मद शरीफ चाचा ऐसे खोए की कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, मोहम्मद शरीफ जिले के अस्पतालों, पुलिस थाने या फिर किसी अन्य जगह जंहा भी लावारिश लाश का पता चलता वंहा पहुँच जाते अपना ठेला लेकर। अगर किसी लाश को 72 घंटों तक कोई लेने नहीं आता तो पुलिस वो लाश मोहम्मद शरीफ को दे देती।  

जिसके बाद शरीफ उस अज्ञात शव का पूरे सम्मान के साथ और उसके धर्म मुताबिक अंतिम संस्कार करते।  शरीफ चाचा ने कभी हिन्दू मुश्लिम में भेदभाव नहीं किया, जिसका जैसा धर्म उस लावारिश लाश का उसी धर्म मुताबिक अंतिम संस्कार। 

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शव किसी हिंदू का हो तो  सरयू के किनारे पूरे रीति-रिवाजों के साथ उसका दाह संस्कार किया जाता, वहीं मुस्लिम होने पर शव को कब्र में दफ्ना देते। इस तरह मोहम्मद शरीफ अब तक हजारो लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं।  लोग तो उन्हें ‘लावारिस लाशों के वारिस और मसीहा’ कहने लगे हैं। 

गरीबी में गुजर रहा है जीवन 

अयोध्या जिले के खिरकी अली बेग मोहल्ले में मोहम्मद शरीफ एक किराये के मकान में रहते हैं। साइकिल मरम्मत की स्थापित दुकान हाशिये पर आ गई. सेवा संवेदना के जोश में गृहस्थी की गाड़ी पटरी से उतर गई। शरीफ के तीन बेटों में एक ने साइकिल मरम्मत की दुकान खोली। दूसरे ने मोटरसाइकिल की मरम्मत का काम शुरू किया और तीसरे ड्राइवर का पेशा अपनाया। 

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शरीफ कई सालों तक दुकान भी चलाते रहे और समाज सेवा के काम में भी लगे रहे। दिनभर में वे दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने लायक ही कमा पाते थे।  लेकिन पैसे की किल्लत कभी भी उनकी समाज सेवा के आड़े नहीं आई। मोहम्मद शरीफ भी घरेलू जिम्मेदारी से ऊपर उठकर अपना मिशन आगे बढ़ाते गए। 

लेकिन अब शरीफ काफी बीमार हैं। इतने कि अब उनके लिए बिस्तर से उठा पाना भी मुश्किल हो गया है। घर की आर्थिक स्थिति भी बेहद नाजुक मोड़ पर आ चुकी है। 

पीएम ने दिया मदद का आश्वासन

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मोहम्मद शरीफ ने बताया कि पद्मश्री मिलने से वो बहुत खुश हैं, उनके काम को लोगों द्वारा सराहा गया और सरकार के द्वारा उनका सम्मान किया गया। इससे उनका मनोबल और बढ़ गया है। शरीफ ने बताया कि उनको इसके लिए किसी भी तरह की सरकारी मदद नहीं मिलती है, जनता से ही पैसा इकट्ठा करके लोगों के अंतिम संस्कार करते रहे हैं, आम लोगों ने खूब सहयोग किया। बड़ा सम्मान मिला सबका आभार। 

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प्रधानमंत्री ने सभी प्रकार के का आश्वासन दिया हैं। मैंने उनसे लावारिश लाशों के अंतिम संस्कार के लिए भी मदद और अपने लिए घर की मांग भी की है, जिसके लिए पीएम की तरफ से हमें आश्वासन मिला है कि मदद की जायेगी।