दलित 'भोजनमाता' ने बनाया खाना, तो ऊँची जाति के बच्चो ने खाने से किया इंकार...महिला की नौकरी गई!

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दलित महिला के हाथ का बना खाना सामान्य वर्ग के छात्रों ने नहीं खाया। मामला उत्तराखंड के एक स्कूल का है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट अनुसार, सवर्णों के बच्चों ने भोजन खाने से इनकार कर दिया क्योंकि भोजन बनाने का काम जिस भोजन माता को सौंपा गया, वह दलित वर्ग की है। यह विवाद इतना बढ़ चुका है कि ज़िला शिक्षा अधिकारी ने प्रधानाचार्य से मामले में रिपोर्ट मांगकर जांच बैठा दी है। 

बताया जाता है कि भोजनमाता की नियुक्ति को लेकर विवाद बढ़ गया है. एक तरफ प्रधानाचार्य इस नियुक्ति को नियमों के हिसाब से बता रहे हैं तो दूसरी तरफ अभिभावक संघ का आरोप है कि नियुक्ति एक सवर्ण भोजनमाता की होनी थी, लेकिन प्रस्ताव के खिलाफ दलित वर्ग की महिला को नियुक्त कर दिया गया। 

गलत नियुक्ति की बात सामने आई!

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट अनुसार, चंपावत के सूखीढांग इंटर कॉलेज में दलित महिला की नियुक्ति ‘भोजनमाता’ के पद पर हुई। बताया गया कि अगड़ी जाति के छात्र इस बात से इतना नाराज हुए कि महिला के हाथ से बना खाना खाने से ही इन्कार कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, राजकीय इंटर कॉलेज सूखीढांग में 230 छात्र पढ़ते हैं।  

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सांकेतिक तस्वीर: The Hindu

इनमें से क्लास 6 से 8वीं तक के 66 बच्चे मिड-डे मील के दायरे में आते हैं। लेकिन सोमवार, 20 दिसंबर को केवल एससी वर्ग के 16 छात्रों ने मिड-डे मील खाया। वहीं सामान्य वर्ग का कोई भी छात्र नहीं आया क्योंकि एससी वर्ग की ‘भोजनमाता’ ने खाना तैयार किया था। ऐसे कई बच्चे घर से ही टिफिन लेकर आए थे। वहीं कइयों ने खाना ही नहीं खाया। इसके बाद विवाद हुआ, स्थानीय मीडिया में खबरें छपीं। 

स्कूल के प्रिंसिपल प्रेम सिंह ने बताया कि सुनीता की ज्वाइनिंग के पहले दिन ऊंची जाति के स्टूडेंट्स ने भोजन किया था। हालांकि, दूसरे दिन से उन्होंने भोजन का बहिष्कार शुरू कर दिया। स्टूडेंट्स ऐसा क्यों कर रहे हैं, यह समझ से परे है।

प्रिंसिपल बोले- सरकारी मानदंडों के हिसाब से नियुक्ति हुई

प्रिंसिपल सिंह ने कहा कि उन्हें सभी सरकारी मानदंडों के हिसाब से नियुक्त किया गया। उन्होंने बताया, 'हमें भोजनमाता के पद के लिए 11 आवेदन मिले थे। स्कूल प्रबंधन समिति खुली बैठक में सामान्य वर्ग की महिला की नियुक्ति को सिरे से खारिज कर रहा है। उनका कहना है कि शासनादेश के अनुरूप ही भोजन माता की नियुक्ति की गई। लेकिन कुछ लोगों को ये पसंद नहीं आय़ा, जिसके कारण लोग विरोध कर रहे हैं। 

वंही ग्रामीणों के मुताबिक अभिभावक संघ और प्रबंधन समिति की मौजूदगी में सर्वसम्मति से खुली बैठक में पुष्पा भट्ट को भोजनमाता नियुक्त किया गया। लेकिन आरोप है कि इस बीच दूसरी महिला को भोजनमाता नियुक्त कर दिया गया। 

मालूम हो कि सरकारी स्कूलों में स्टूडेंट्स की अटेंडेंस बढ़ाने और उन्हें पौष्टिक आहार देने के लिए मिड डे मील की व्यवस्था की गई है। सुखीढांग हाई स्कूल में रसोइयों के दो पद हैं। शकुंतला देवी के रिटायर होने के बाद सुनीता देवी की नियुक्ति हुई।

महिला की नौकरी भी गई!

अमर उजाला की खबर के मुताबिक, अनुसूचित जाति की महिला को भोजनमाता बनाए जाने से सामान्य वर्ग के छात्रों ने उनके हाथ का खाना खाने से इन्कार कर दिया। मुख्य शिक्षा अधिकारी ने बताया कि खुली बैठक में दोनों पक्षों को सुनने और अभिलेखों की जांच में भोजनमाता की नियुक्ति अवैधानिक पाई गई। इसलिए नियुक्ति रद्द कर दी गई। अब जल्द ही नए सिरे से विज्ञप्ति निकालकर भोजनमाता की नियुक्ति होगी। 

भोजनमाता को हटाने पर पूर्व सीएम रावत क्या बोले?

सूखीढांग राजकीय इंटर कॉलेज में भोजनमाता विवाद को पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने दु:खद बताते हुए राज्य सरकार को आड़े हाथ लिया। उन्होंने कहा कि ऐसी दुखद घटना वाला हमारा उत्तराखंड नहीं हो सकता। ये भाजपा का ही उत्तराखंड हो सकता है, जहां एक भोजनमाता को केवल इसलिए हटा दिया जाए क्योंकि वह एक वर्ग विशेष की है।