पहुंची मदद! पिता को घर, बच्चों को स्कूल देकर इस परिवार की सरकार ने सँवारी किस्मत!

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हाल ही में एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमे एक रिक्शाचालक पिता अपने बच्चों को सड़क किनारे पढ़ा रहा था। इस शख्स की पत्नी ने छोड़ दिया था और सर ढकने के लिए कोई मकान भी नहीं था। लेकिन जैसे ही ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, तुरंत प्रसाशन ने परिवार की मदद के लिए दौड़ लगा दी। क्या है पूरा मामला आइये आपको बताते है। 

मिली छत और बच्चों के लिए स्कूल 

अच्छी ख़बर ये है कि इस रिक्शाचालक की परेशानी सीएम तक पहुंची और उसे सीधे मदद मिल गई। सीएम के निर्देश के बाद बच्चों को शहर के स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी विद्यालय में दाखिला भी मिल गया है। इसके अलावा परिवार को रहने के लिए घर का इंतज़ाम भी हो गया है। 

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Image source: NBT

बिलासपुर कलेक्टर ने उनको कार्यालय बुलाकर गणवेश, पाठ्य पुस्तक और अध्ययन के लिए अन्य जरूरी साम्रगी भी दी। इतना ही नहीं दोनों बच्चो को स्कूल ड्रेस भी प्रशासन की तरफ से उपलब्ध करवाए गए हैं। साथ ही कलेक्टर के निर्देश पर नगर निगम की तरफ से राजकिशोर नगर में आईआरडीपी योजना के तहत निर्मित आवास उपलब्ध कराया गया है। 

क्या है पूरा मामला 

बीते दिनों, एक तस्वीर वायरल हुई। गणेश साहू के पास ना सिर छुपाने के लिए छत है, और ना ही अपने बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए इतना पैसा जो बह उन्हें स्कूल तक भेज सके। गणेश के दो बच्चे हैं- 9 साल की बेटी गंगा और 7 साल का बेटा अरुण। गंगा और अरुण की मां उन्हें अरुण के पास छोड़ कर चली गई। 

अतिक्रमण में उनकी झोपड़ी टूट गई, जिसके बाद ये परिवार बेघर हो गया।  मजबूरी में उसे रिक्शे को ही अपना घर बनाना पड़ा। फिलहाल, गणेश का रिक्शा ही उनका घर है जिससे वह रोजीरोटी भी कमाते हैं। बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने के लिए गणेश सड़के किनारे चादर बिछाकर ही उन्हें पढ़ाता है। 

खुद पढ़ाते हैं बच्चों को

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Image source: Dainik Bhaskar

गणेश साहू एक ऐसे पिता है, जिसके पास सिर छुपाने के लिए छत भी नहीं है। लेकिन फिर भी वो अपने बच्चों की जिंदगी संवारने की कोशिश में जुटे हुए है! वह रिक्शा चलाकर अपने दो बच्चों का पेट भरने के साथ-साथ उन्हें पढ़ा भी रहे हैं।

गणेश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए उनके दोनों बच्चे स्कूल नहीं जा पाए। वह अपने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा इसी तरह दे रहा है। बच्चों को एबीसीडी और क ख ग घ का ज्ञान दे रहे हैं गणेश। उसकी मजबूरी ये है कि रिक्शा न चलाएं, तो बच्चे भूखे रह जाएंगे। 

लेकिन इस बेबस पिता ने उनको पढ़ाने की उम्मीद नहीं छोड़ी। घर नहीं है, फिर भी वो सड़क किनारे चद्दर बिछाकर दोनों किसी तरह थोड़ा बहुत पढ़ाने की कोशिश करते हैं। 

पत्नी छोड़कर चली गई

रिक्शा चालक गणेश का जीवन चुनौतीयों से भरा है। पत्नी साथ नहीं रहती, बह छोड़कर चली गई। फिर भी उन्होंने निराशा को छोड़, उम्मीद को चुना। सिंगल पैरेंट्स बन माता और पिता दोनों की ही ज़िम्मेदारी उठा रहा है गणेश।