कश्मीर अलगाववाद के बड़े नेता रहे गिलानी का निधन, एक दिन शोक में रहेगा पाकिस्तान

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syed ali shah geelani

अलगावादी कश्मीरी नेता सैयद अली शाह गिलानी का निधन हो गया है। वह 92 साल के थे। गिलानी के परिजनों ने उनकी मौत की पुष्टि की है। आपको बता दे, सैयद अली शाह गिलानी कश्मीर के अलगाववादी संगठनों के समूह हुर्रियत कांफ्रेंस के संस्थापकों में शामिल थे। अब ये दल निष्क्रिय है। उधर, कश्मीर के आईजीपी विजय कुमार ने कहा कि गिलानी के निधन की खबर मिलने पर कश्मीर में कुछ पाबंदियां लगाई गई हैं। इंटरनेट भी बंद कर दिया गया है।

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गिलानी के निधन के बाद जहां कुछ नेताओं की ओर से शोक व्यक्त किए जा रहे हैं वहीं कई नेता उनके निधन के बाद राजनीतिक बयानवाजी कर रहे हैं। गिलानी के इंतेकाल के बाद जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती समेत कई नेताओं ने शोक जताया है वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान राजनीति शुरू कर चुके हैं। 

पाकिस्तान में राजकीय शोक 

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15 सालों तक पूर्व जम्मू कश्मीर राज्य की 87 सदस्यों वाली विधानसभा के सदस्य रहे गिलानी की मौत पर पाकिस्तान में नयी सियासी चाल चली गई है। ABP न्यूज़ की एक रिपोर्ट अनुसार, इमरान खान ने उनकी मौत के बाद राजनीति करते हुए पाकिस्तानी झंडे को झुका दिया। इसके अलावा इमरान खान ने एक दिन के लिए राष्ट्रीय शोक का एलान किया है। इमरान खान ने कहा कि गिलानी के निधन की खबर सुनकर बहुत दुखी हूं। 

सैयद अली शाह गिलानी की मौत पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी ट्वीट करके दुख जताया। उन्होंने पाकिस्तान में एक दिन के राष्ट्रीय शोक की भी घोषणा की है। उन्होंने ट्वीट किया:-


“कश्मीर में आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सैयद अली गिलानी की मौत की खबर सुनकर काफी दुख हुआ। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लोगों के संघर्ष के नाम कर दी। पाकिस्तान उनके हौसले को सलाम करता है। पाकिस्तान उनकी मौत पर एक दिन का आधिकारिक शोक मनाएगा और झंडे को झुका दिया जाएगा।”

आपको बता दे, गिलानी पर पाकिस्तान की फंडिंग के सहारे कश्मीर में अलगाववाद भड़काने के आरोप लगे। उन पर कई केस भी दर्ज हुए, जिसके बाद उनका पासपोर्ट भी रद्द कर दिया गया। NIA और ED ने टेरर फंडिंग के मामले में जांच की थी, जिसमें उनके दामाद समेत कई रिश्तेदारों से पूछताछ हुई थी। 

गिलानी के निधन पर क्या बोले कश्मीरी नेता?

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने एक ट्वीट में कहा है, 'गिलानी साहब के निधन की ख़बर से दुखी हूं। बहुत से मुद्दों पर हमारे बीच मतभेद थे लेकिन मैं उनका सम्मान करती हूं। अल्लाह उन्हें जन्नत में जगह दे और उनके परिजनों को सब्र दे।'


एक वक्त तक हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का हिस्सा रहे सज्जाद लोन ने भी दुख जताया।  उन्होंने लिखा, “सैयद अली शाह गिलानी के परिवार को मेरी दिल से संवेदनाएं। वो मेरे पिता के बहुत करीबी सहकर्मी रहे। अल्लाह उन्हें जन्नत बख्शे।”


कैसा रहा गिलानी का राजनैतिक कैरियर?

1972, 1977 और 1987 में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सोपोर से सदस्य रहे गिलानी को पाकिस्तानी सरपरस्त नेता कहा जाता था, अक्सर उनके बयानों में पाकिस्तान प्रेम साफ़ तौर पर दिखाई देता था। गिलानी कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते थे और उसे अलग करने की मांग करते थे। उन्होंने 1990 के दशक में आतंकी हिंसा और अलगाववाद की सियासत करने वाले धड़ों को मिलाकर ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का गठन किया था। 

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इसमें 1987 के चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस की खिलाफत करने वाले तमाम गुट शामिल हो गए थे। वह जमात-ए-इस्लामी का प्रतिनिधित्व करते थे जिसे अब प्रतिबंधित कर दिया गया है। उन्होंने 1989 में सशस्त्र संघर्ष शुरू होने के दौरान अन्य चार जमात नेताओं के साथ इस्तीफ़ा दे दिया था। 

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29 सितंबर 1929 को सोपोर में जन्मे गिलानी को हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का उदारवादी चेहरा माना जाता था। गिलानी ने कॉलेज की पढ़ाई लाहौर से की थी। उस समय लाहौर भारत का हिस्सा था।